यादें

मूर्ख बन जी रहा था, तेरी याद में 
सोचा कभी तो क़िस्मत, देगी साथ मेरे ।
पर किधर मालूम, ऊँची कितनी दिवार 
दिवार तेरे अहम का, पार ना कर पाया मैं।।

एक दिन ऐसा आएगा, जब  ढूँढोगे मुझे 
लोक लज्जा अहम त्याग, प्यार करोगी मुझे ।
साथ सदा पाओगी, बस मुड़ कर देख मुझे
खड़ा अकेला उत्शुक, तेरी याद मन लिए।।
कुणाल कुमार 

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