साथ

वो साथ मेरे बैठे, ज़रा सा मुश्कुराय,
उसकी ये अदा, मुझे जो बड़ा भाए,

हर ग़म भूल, उनकी हँसी में खोने का मज़ा,
स्वर्ग की कोई अप्सरा वो मुझे नज़र आए,

मेरे ये दो नयन, उनकी मासूमियत पे अटके,
उनके अप्रतिम सौंदर्य के सागर में गोते खाए,

थम सा गया समय, जो उनकी मासूमियत निहारे,
मिले जिनको उनका साथ, है नसीब उसके भारी.

चाहा मन गले लगा लू, समेट लू उन्हें बहो में,
चूम लू उनको, दिल में भरे अपने एहसासों से,

अपने ख़्वाबों में भटक, ज़रा सहम सा गया,
यह क्या मैं अपने ख़्वाब पे, क्यों अटक गया,

दिल नादान उसे समझाया, प्यार से उसे मनाया,
ख़्वाब होते है सपने, जो बनते कभी नहीं अपने.

जीने की बस यही एक हक़ीक़त है,
ख़्वाब के आगे भी एक सुनहरा जीवन है.

कुणाल कुमार

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