औरत होती गाय समान

औरत होती गाय समान, दिखने मैं सदा परेशान,
वो खुद की मर्ज़ी भूल, सदा बंधी रही खूँटे के संग,

भूल पक्षी सी उड़ान, होकर वो अपनों से परेशान,
बंधी हुई खूँटे पे तंग, सोचकर है वो अपनों के संग,

अपने भी है कमाल, देखो उनका स्वार्थ जो महान,
खुद ना कि कभी समझौता, अपने विपणन के मार्ग,

औरत सदा करे समझौता, सीधी साधी गाय समान, 
बंध  खूँटे पर अपने आप, दे लगाम अपने उड़ान पे,

सोचती ये खूँटा अपना है, बस वही उसका सपना है,
कर समझौता जीती है, देखो सीधी सधी गाय समान,

औरत होती गाय समान, वो बंध खूँटे पे बने महान,
कभी माँ बन बच्चे की सोचे, कभी अपने माँ की सोचे,

सिर्फ़ अपना सोचे, बाक़ी सब जो है उसके धोखे,
अपना अब मैं भी सोचूँ, छोड़ गाय पीछे मैं आगे बढ़ूँ.

कुणाल कुमार 

 

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