शायरी की डायरी – K.K Original

हम तो चले थे जमाने से अपना मुक़्क़दर बनाने,
हमें क्या पता था ज़माना खुद को ही घर कर लेगा,
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तुम्हारी छोटी छोटी सी बातें माहौल को रंगीन बना देती है,
नहीं तो और भी दर्द हैं दिल में जनाब जो मुझे गमगीन कर देती है,
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प्यार में बेचारा दिल ने खुद को मजनू समझ बैठा,
पर भूल गया लैला तो किसी और से ब्याही गयी थी,
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कैसी हैं मजबूरी ये मेरे हाल ए दिल का,
रक्त के जगह पर यादें संचारित कर रहा,
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तुम्हारे इंकार करने से क्या कम होगा मेरा प्यार तुमसे,
तुम्हारे जाने का ग़म भूल जाएँगे तुम्हारे यादों के सहारे,
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वो कहती हैं मुझसे की दूर चला जाऊँ उससे,
इससे तो अच्छा होता वो मुझे मेरी जान माँग लेती,
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क्योंकि कोई ज़िंदा कैसे रह सकता है रूह के बिना,
जैसे शरीर नहीं जी सकता रक्त प्रवाह के बीना,
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तुम्हारे चाहत में एक अजीब सा नशा हैं मेरी जान,
एक पल ना सोचूँ तुम्हें तो मेरा दिल दर्द से भर जाता है,
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सुबह से शाम तक जुदाई का ग़म मेरे दर्द दिल को देता है,
पर रात कि तुम आकर मुझे मेरे सपने में प्यार कर जाती हो,
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तुम्हें भूलना तो चाहता हूँ मैं दिल से,
पर कम्बख़्त दिल तो मैंने तुम्हें दे दिया,
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मेरा मुक़्क़दर हैं दूर खड़ा कर रहा इंतज़ार तुम्हारा,
समेट लो मुझे अपने बाँहों में और दे दो मुझे मक़सद नया,
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कभी कभी हँसी आती है मुझे खुद के बेबसी पर,
तुम्हारा प्यार दिखता है मुझे तुम्हारे इंकार के पार,
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तुम्हारी ख़ूबसूरती मुझे रूहानी क्यों लगती हैं,
जैसे देवी खुद आ गयी तुम बनकर मुझे अपनाने के लिए,
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जान बनकर जान के क़रीब हो तुम मेरे,
कही जान बनकर जान ही ना ले लो तुम मेरे,
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