इक मुलाक़ात अजनबी दिल से…

इक मुलाक़ात अजनबी दिल से,
यूँ ज़िंदगी के सफ़र में हो गया,
दिल धड़कना मेरे दिल में,
क्यों फिर से शुरू हो गया,

सोया था ये बेचारा दिल,
अल्प विराम जो था उसका स्थान,
पर ना जाने क्यों तुम्हें देख,
खुद बख़ुद धड़कना शुरू कर दिया,

अजीब माया हैं ये जीवन,
सभी खोजे यहाँ अपनी ख़ुशी,
कोई तो बताए मुझे,
क्यों ना दे सकता मैं दूसरों को ख़ुशी,

नहीं विश्वास मुझे खुद पे,
नहीं मेरे नसीब में लिखी कोई ख़ुशी,
पर अपने नसीब को पीछे छोड़,
क्यों ना दे सकता मैं दूसरों को ख़ुशी,

मेरा दर्द अब मैं खुद समझूँ,
सुलझाना इसको है मेरा काम,
शायद कुछ लोगों को नहीं मिलती,
कभी उनके दिल की चाहत बन ख़ुशी,

कुदरत का यहीं हैं फ़लसफ़ा,
हर कोई जी रहा अपनी ज़िंदगी,
बंद कर लूँगा मैं अपने दिल को,
भूल कर मैं अपनी ज़िंदगी।

कुणाल कुमार

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