ख़्वाब और तमन्ना…

अगर ख़्वाब हो परिपूर्ण,
तो तमन्ना होगी और चाहत की,
संतुष्टि किधर मिलती हैं जीवन में,
जिसे दिल से चाहत के फ़साने लिखने हों।

यहाँ तो लोग अधूरी ख्वाहिशों में,
जीवन जीने का मज़ा ढूँढते है,
मैं तो अपने अधूरी ख़्वाबों को,
मुकम्मल करने का सोचता हूँ।

अगर सच में हिम्मत है दिल में,
और सच्ची चाहत है जीवन जीने की,
करो हिम्मत दिल में तमन्ना रखने की,
और बढ़कर कोशिश करो उसे पाने की।

कुणाल कुमार

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निशब्द …

निशब्द सा देख रहा,
अपनों के द्वारा कहे बोल,
अपनापन जता रहे हैं वो,
पर मुझे अपना बनाने से क्यों डर रहे वो।

झूठी आशा की गोद बना,
प्यार भरी लोरी सुनाते रहते,
जब दिल की बात होती है तो,
दिल तोड़ मुँह मोड़ चले जाते हैं वो लोग।

निशब्द सा रह गया मैं,
खुद को समेट यादों के आँचल में,
तुम तो दूर चली जा सकती हों,
पर साथ बिताए वो पल कैसे छिन पाओगी तुम।

कुणाल कुमार

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विश्वास…

विश्वास हमें क्यों नहीं होता हैं,
वो ख़ुदगर्ज़ी में मुझे छोड़ बढ़ चले,
अपनी दिल के किसी कोने में,
मेरी याद वो वो दफ़न कर बैठे।

बस गुस्ताखी इतनी हुई मुझसे,
चाहा आपको मैंने खुद से बढ़कर,
आपसे ज़्यादा चाहने की सजा मुझे मिली,
इसीलिए आप मुझे मेरे हाल पे छोड़ चले।

वैसे मैंने देखा हैं आपको,
करते वही जो आप समझे सही,
फिर भी ना जाने क्यों बहाना बनाया आपने,
लोग क्या कहेंगे कहकर मुझे छोड़ चली।

याद रखो आप एक महवत्पूर्ण बात,
लोग देते हैं साथ अगर आपको खुद पर हो विश्वास,
लोग समाज बनाने का काम करते हैं,
ना की रिश्तों को तोड़ने में लोगों का नाम होते है।

कुणाल कुमार

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आत्म काव्य…

लिख रहा हूँ जीवन के,
कुछ अनकहे अनसुने सच,
मेरे दर्द से भरे ज्वालामुखी से,
कर रहा हूँ सच का प्रवाह।

काल चक्र के अनोखे रंग,
बचपन जवानी और बुढ़ापे रूप में जी रहे हम,
हर मोड़ पर हमें साथी मिले,
नाम हैं उसका सुख और दुःख।

जीवन कि धारावाहिक में,
हर एक प्रकरण का है अपना मोल,
यह तो अपने अपने समझने की बात है,
क्या सिख लेना हैं हमें अपने प्रकरण से।

बचपन

बचपन बीता सुख दुःख में,
ख़्वाब जवानी का दिल लिए,
जूझ रहा था अपने दर्द से,
फिर भी हौसला था जीने का मुझमें।

थोड़ा सा बड़ा हुआ जो मैं,
बीमारियाँ से हुई दोस्ती प्रगाढ़,
नसीब अच्छा था जो मेरा,
बिस्तर ने दिया साथ मुझे वर्ष भर।

कुछ बारह साल का हुआ होगा मैं,
क़िस्मत ने फिर एक बार करवट लिया,
किया शोषण कुछ अपनों ने,
शरीर को तो कष्ट दिया पर दुःख आत्मा को छलनी से हुआ।

जो थोड़ा बड़ा हुआ और,
पाँव परने वाले थे जवानी के दहलीज़,
तभी पक्षाघात ने किया प्रहार,
मेरे चेहरे को दिया विकार। (Bell’s Palsy)

जवानी

जवानी की शुरुआत हुई,
पक्षाघात का लिया विकार चेहरे पे,
जिस उम्र में अपनापन सबको मिले,
मुझे मिला सिर्फ़ सामाजिक तिरस्कार।

फिर भी हार ना माना मेरा दिल,
सोचा पढ़ लिख कर पा लूँगा मंज़िल,
सारे सम्बंध तोड़ कर मैंने,
जी तोड़ पढ़ाई के ऊपर मैंने मेहनत है की।

नौकरी मिला और मिला मुझे सुख समृद्धि,
शांति से जीने की ख़ुशी दिल से मैंने महसूस की,
पर थी ख़ुशी मेरी क्षणभंगुर सी,
कुछ समय ही सिर्फ़ मेरे पास रही।

मधुमेह और रक्तचाप ने चुपके से दस्तक दिया,
मेरे व्यस्त जीवन को अपना परिचय दिया,
हँसता खेलता जीवन थम सा गया,
दिमाग़ी पक्षाघात से मैं त्रस्त हुआ।

जीवन झूल रहा था मेरा,
जीवन और मृत्यु के बीच,
चाहत नहीं थी जीने की दिल में,
मृत्यु के स्वागत में मैंने खुद को लगा लिया।

पर शायद अनचाहा था मेरा नसीब,
ईश्वर को भी मैं नहीं था स्वीकार्य,
वापस लौट आया अपने जीवन को मैं,
क्योंकि शायद कष्टों भरा पल अभी और था मुझे जीना।

अचानक लगा नसीब थोड़ा चमका,
ईश्वर ने शायद मुझ पे की मेहरबानी,
एक दिन मुलाक़ात हुई मुझे मुझसे,
मुझे मेरी जीने की मक़सद मिल गयी।

प्यार जो कभी मिला ना था मुझे,
थोड़ा अपनापन का भी था मुझे इंतज़ार,
ईश्वर ने मिलाया मुझे उससे,
जैसे लगा मुझे मिल गया अपना प्यार।

सुनहरे ख़्वाब में जीने लगा,
खोजने लगा उसमें मेरा प्यार,
चाहत बेलगाम सा हो गया,
लगा जैसे मैंने पा लिया मेरे जीवन जीने का सार।

दिन बीते बीती ख़्वाब भरी मेरी रातें,
अहसास भरे समंदर में गोते खा रहा था मेरा दिल,
था दिल में अद्वितीय अहसास जीवन जीने की,
पर अचानक से लग गए मेरे अहसास पर लगाम।

ख़ुशी मुझे रास नहीं आयी,
उसे अपने पुरानी प्यार याद आयी,
छोड़ चली वो भी मुझे मँझधार,
जीवन को मेरे कर वीरान।

फिर भी हिम्मत हारा नहीं दिल,
खुद को चुप कर जी रहा ये जीवन मुश्किल,
शायद कुछ लोग होते है यहाँ,
जिन्हें नहीं मिलती है उनकी ख़ुशी।

आगे का जीवन जीना अभी बाक़ी हैं,
खुद को ढूँढना हैं मुझे अपनी सोच में,
पाना हैं मुझे वापस जीने की मक़सद,
और लिखना हैं मुझे अपने आगे के जीवन का सफ़र।

मेरी लेखनी का उद्देश्य एक,
तकलीफ़ों में ना खो अपना विवेक,
जीवन हैं एक निरंतर प्रवाह,
सुख को तुम गले लगा और दुःख से ना कभी घबरा।

कुणाल कुमार

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Tried to summarize important life events in simpler poetic manner.

प्यार…

कुछ लोग याद हमें,
कभी कभी करते है,
पर सच्चाई से चाहने वाले,
हर धड़कन में अपने प्यार को करते है।

क्या प्यार भी फ़ुर्सत से कही करते हैं,
अपने बनाए शर्तों में प्यार को क्या करते है,
प्यार तो दिल का वो अहसास है,
जिसका अहसास हम हर घड़ी करते हैं।

प्यार करती हो अगर तुम दिल से,
तो सोचने की ज़रूरत क्यों पड़ी तुम्हें,
मैंने तो प्यार को अपनी ज़िंदगी दे रखी,
और प्यार का परिणाम से परिणय तक सोच रखी।

कुणाल कुमार

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सोचा ना था…

सोचा ना था कभी,
दूर हो जाओगी तुम मुझसे,
फूल तो मिली मुझे काग़ज़ की,
पर सुगंध किसी और के लिए थी।

सोचा ना था कभी,
तुम बस जाओगी ख़्वाब में मेरे,
प्यार तो दिल करता है सिर्फ़ तुम्हें,
पर इकरार की ख़ुशी किसी और को मिली।

सोचा ना था कभी,
तुम्हारे प्यार में काटूँ दिन रात यूँ ही,
साथ तुम्हारा चाहे ये दिल बेचारा,
पर तुम साथ हो बन किसी और की।

कुणाल कुमार

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रात…

यहाँ सभी रात काटते हैं,
सुबह के किरण के लिए,
मैं तो इसीलिए सोता हूँ,
ताकि सुबह देख सकूँ तुम्हें।

दिल की बेचैनी हैं सिर्फ़,
तेरे पास ना आने से,
दूर रहकर भी दिल धड़क रहा,
बस तेरे दिए याद के सहारे।

क्या कभी सच समझोगी तुम,
या यूँ रहोगी सिर्फ़ अपने बनाए ख़्वाब में,
खुद को खुशनसीब समझ पाता,
अगर तुम्हारे ख़्वाब में मुझे छोटी सी जगह मिल पाती।

जाने दो दिल कि बातें,
ये तो सिर्फ़ दिल वाले ही समझे,
आपने तो अपनी दिल को पत्थर बना रखा,
और क्या पत्थर पे कभी प्यार भरे फूल खिलते।

कुणाल कुमार

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प्यार की समझ…

कुछ लोग प्यार को,
अपनी सहूलियत से करते है,
जब समय मिले खुद से,
तो प्यार करने का दिखावा करते है।

क्या प्यार याद करने की चीज़ है,
जो कभी कभी लोग याद की दिखावा करते है,
हम तो यहाँप्यार में जीते है,
अपनी हर साँस में उसे याद करते हैं।

अब तो ये उसकी सोच है,
जो नहीं समझ पाई हैं मुझे,
शायद उसे प्यार की समझ नहीं,
या नहीं जी सकती हर घड़ी प्यार में।

कटुता और करवाहट,
शायद यहीं प्यार हैं उसके लिए,
पर मैं तो दिल से प्यार करता हूँ उसको,
अपने प्यार में कटुता कभी ला सकता नहीं मैं।

कुणाल कुमार

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कैसी है दिल कि मजबूरी…

सोचता हूँ कभी कभी,
क्यों समझ नही पाई आप मुझे,
क्या कुछ ग़लत किया प्यार कर मैंने,
या आप समझना नहीं चाहती हो मेरी कही।

काश समझ पाती हाल ए दिल कि कही,
बनकर रह जाता मैं आपका आपके क़रीब,
पर देखो कैसी है दिल कि मजबूरी,
जो चाहता हैं आपको दिल से पर नहीं पता आपको क़रीब।

शायद हैं ये मेरी हैं मजबूरी,
या हैं आपकी ख़ूबशूरती,
जो दिखे ताज सा सुंदर,
समेटे खुद में कब्र मेरे प्यार की।

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इंतज़ार…

इंतज़ार करता दिल मेरा,
मायूस सा होने लगा,
क्या पता वो समझ पाएगी,
दिल तो सिर्फ़ याद में धड़क रही।

रितु बदले बदला सारा जहाँ,
पराए भी हो गए यहाँ अपने,
पर जाने क्यों नहीं समझ पाई हाल ए दिल,
जो जी रहा है प्यार के इंतज़ार में।

सच्चाई ना समझने की ठानी है उसने,
अपनी ही की मनमानी जो उसने,
वो क्या समझेगी इंतज़ार कि घड़ी,
उसने तो प्यार कि महत्व ही नहीं पहचानी।

कुणाल कुमार

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ख़ुदगर्ज़ी…

कहते है वो मेरे दिल को ख़ुदगर्ज़,
जो चाहता है सिर्फ़ उन्हें हर घड़ी,
अगर खुद से ज़्यादा चाहना उनको,
हैं मेरी ख़ुदगर्ज़ी तो यह ही सही।

शायद यहीं हैं मेरी मक़सद जीने कीं,
जीना है मुझे सिर्फ़ दिल लिए उनकी छवि,
अगर आज मौत आ जाए तो कोई ग़म नहीं,
क्योंकि आख़िरी मुस्कान तो थे सिर्फ़ उनके लिए।

हाँ ये मेरी ख़ुदगर्ज़ी हैं,
क्योंकि तुमसे प्यार सिर्फ़ मैंने कीं,
तुमने तो अपने दिल में मुझे कभी जगह नहीं दी,
पर मैंने अपनी ज़िंदगी तुम्हारे नाम कर दी।

कुणाल कुमार

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सुनो ज़रा…

सुनो ज़रा मेरे दिल की ध्वनि,
हर एक धड़कन कह रही तुम हो वही,
जिसे चाहा मेरा दिल हर घड़ी,
क्योंकि तुम ही हो मेरे प्यार की स्मृति चिह्न।

सुनो ज़रा अपने दिल की कही,
सोचो क्या हैं मेरे प्यार में कमी,
पर शायद नहीं है जगह दिल में आपके,
इसीलिए चाहने के बावजूद नहीं अपना सकी मुझे।

सुनो ज़रा लोगों की कही,
क्या वो नहीं समझ पाएँगे दो दिलों की मजबूरी,
मेरे सच्चे प्यार को समझ ज़रूर,
साथ तो देंगे लोग मेरे दिल की कही।

कुणाल कुमार

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